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बूढ़े बरगद को भी साल रहा आंगन की वीरानगी

Publish Date:Sun, 10 Jun 2012 10:12 PM (IST) | Updated Date:Sun, 10 Jun 2012 10:12 PM (IST)
बूढ़े बरगद को भी साल रहा आंगन की वीरानगी

जागरण प्रतिनिधि, बांका : बदलते परिवेश ने लोगों के जीवन शैली को भी बदल दिया है। गांवों में वृक्ष तले जमने वाली चौकड़ी, अमुआ की डाली से झूलते बच्चे अब विरले ही नजर आते हैं। कल तक गुलजार रहने वाले बूढ़े बरगद व पीपल की छांव मे आज वीरागनी छायी रहती है। शायद इस बदलाव से उन बूढ़े वृक्षों की रौनक को भी ग्रहण लग गया है। इन वृक्षों की छांव में होने वाली हंसी व ठिठोली अब गायब है।

फुरसत के क्षण में युवक हो या वृद्ध सभी की चौपाल लगती थी। फिर शुरू होती थी देश व दुनिया की बातें। अपने आंगन की विरानगी बूढ़े बरगद व पीपल को भी साल रहा है। बच्चे हो या बूढ़े सभी को गांव का वह बरगद प्यारा था। बच्चे पेड़ के छांव में झूला लगाकर खूब झूलते थे तो बड़े-बुर्जुगों की ताश का खेल चलता था। जबकि युवकों की टोली भी पेड़ के नीचे हंसी ठिठोली किया करते थे। यहां तक कि गांव की कोई भी छोटी-बड़ी समस्या हो पेड़ के नीचे बैठकर सुलझाया जाता था। गांव की पंचायत भी यहीं जमती थी। लेकिन आज माहौल बदल चुका है। आर्थिक युग में सभी पैसे के पीछे भाग रहे हैं। समय का अभाव के कारण अब पेड़ के नीचे चौकड़ी नहीं जमती। बच्चे का झूला छूट चुका है। युवाओं की ठिठोली कहीं खो गई है। राधेश्याम मिश्र, महेन्द्र मिश्र, सदानंद सिंह, मोहन दास कहते हैं कि गर्मी के दिन में शाम व जाड़े के मौसम में धूप के समय पेड़ के नीचे लोगों की जमघट रहती थी। तब बिजली गांवों से दूर थी। घरों में पंखे व कूलर नहीं थे। पेड़ के नीचे काफी राहत महसूस होती है। बच्चे वीडियो गेम व टीवी में अपना सिर नहीं खपाते थे। वह झूले व हमउम्र के साथ खेलते थे। युवकों को कम्प्यूटर का शौक नहीं था। लेकिन अब सबकुछ बदल गया है। चंदननगर, विजयनगर, विशनपुर सहित दर्जनों गांवों के लोगों का कहना है कि पेड़ के नीचे शुरू हुई दोस्ती जिन्दगी भर चलती थी। समय समय के साथ दोस्ती और गहरी होती जाती थी। लेकिन अब पेड़ की छांव तो है लेकिन वहां कोई नहीं पहुंचता। राजकुमार सिंह, सुदर्शन सिंह का कहना है कि पेड़ के नीचे स्वच्छ हवा मिलती थी जिससे स्वास्थ्य भी अच्छा रहता था। दु:ख-सुख में सभी सम्मलित होते थे। किसी के यहां शादी हो तो पूरा गांव एक हो जाता था। लेकिन अब ग्रामीण क्षेत्र में भी शादी व अन्य समारोह में हमें परेशानी होती है। काश ऐसा हो कि हम बरगद के छांव तले हम फिर पहुंचने लगें। ताकि खो चुके वह प्रेम व एकरूपता फिर हमारे मन में घर कर जाय। आज पीपल का वीरान आंगन हमें फिर से बुला रहा है..।

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